बादल और मैं

IMG_20170702_095646.jpgकुछ इस तरह आज बादल को ज़मीन पर उतरते देखा जैसे पूछ रहा हो, "चलोगी मेरे साथ? तुम्हे लेने आया हूँ इस भीड़ के परे, आओ थाम लो मेरा हाथ।"
मन तो मेरा भी हुआ की बारिश की बूंदों में छिप कर निकल चले इस कोलाहल से कहीं दूर।
"धुप में पैर नहीं जलेंगे तुम्हारे, मैं नर्म रुई सा अपना आँगन बिछा दूंगा। धीरे धीरे तुम रखना कदम अपने हवा में तितली बना फिर उड़ा दूँगा।" उसने कहा मुझसे।
उसकी तज़वीज़ में दम था, कहीं उड़ जाने का मेरा भी मन था, पर जाने कौनसी अदृश्य बेड़ी से बंधा हैं अस्तित्व मेरा जो रोक लेती हैं कदम हर दफा?
"फिर किसी दिन आना बादल। तब चल दूँगी मैं साथ तुम्हारे। कुछ सफर और तय करने हैं बाकी, फिर कभी जब ज़मीन पर उतरोगे, इंतज़ार करती मिल जाऊंगी मैं इसी किनारे।"

Comments

  1. Aaaah I feel like taking wings and flying in the clouds myself. 👏👏👏

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  2. Ha ha ... See the pic I just inserted. The view that inspired the write. It was 10 in the morning.

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  3. बहुत सुन्दर रचना लिखी है आपने ।

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  4. Thank You. I guess mausam ka kamaal hain

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